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Khandwa Collector Viral Video: जनसुनवाई में बुजुर्ग से विवाद, सुरक्षाकर्मियों ने बाहर निकाला

मध्य प्रदेश के खंडवा में जनसुनवाई के दौरान बुजुर्ग और कलेक्टर के बीच विवाद का मामला सामने आया है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार करीब 65 वर्षीय प्रकाशचंद राजाणी अपनी वर्षों पुरानी दुकान से जुड़ी शिकायत लेकर जनसुनवाई में पहुंचे थे।



 एक बुजुर्ग वर्षों से अपनी परेशानी लेकर सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा रहा था। उम्मीद थी कि जनसुनवाई में उसकी बात सुनी जाएगी, उसकी समस्या का समाधान होगा और शायद वह सम्मान भी वापस मिलेगा, जिसे वह वर्षों से खोता चला आया हलेकिन शायद उसे यह मालूम नहीं था कि वह जिस दरवाजे पर अपनी गुहार लेकर पहुंच रहा है, वहां उसकी समस्या से ज्यादा महत्वपूर्ण पद की गरिमा समझी जाएगी।खंडवा की जनसुनवाई में सामने आए इस घटनाक्रम ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।एक बुजुर्ग जब किसी अधिकारी के सामने अपनी शिकायत लेकर पहुंचता है तो वह केवल एक आवेदन लेकर नहीं आता। वह अपने साथ वर्षों की परेशानी, उम्मीद और न्याय की आखिरी आस लेकर आता है। ऐसे व्यक्ति से अगर यह अपेक्षा की जाए कि वह अपने आवेदन पर हुई कार्रवाई के बारे में जानना चाहे, तो इसमें आखिर गलत क्या है?अगर बुजुर्ग यह पूछता है कि “मेरी शिकायत पर आपने क्या लिखा है, मुझे पढ़कर बता दीजिए”, तो क्या उसका सवाल इतना बड़ा था कि बातचीत का स्वर ही बदल जाए?यहां सवाल किसी व्यक्ति विशेष को कटघरे में खड़ा करने का नहीं है। सवाल उस प्रशासनिक संवेदनशीलता का है, जिसकी उम्मीद आम आदमी अपने अधिकारियों से करता है।कलेक्टर जैसे संवैधानिक और महत्वपूर्ण प्रशासनिक पद पर बैठे अधिकारी से समाज केवल आदेश की अपेक्षा नहीं करता। समाज उनसे संवेदनशीलता, धैर्य और मानवीय व्यवहार की भी अपेक्षा करता है।हमारे समाज में बुजुर्ग केवल एक शिकायतकर्ता नहीं होता। वह अनुभव और सम्मान का प्रतीक माना जाता है। और जब वही बुजुर्ग न्याय की उम्मीद लेकर किसी अधिकारी के सामने खड़ा हो, तो उसके साथ व्यवहार में संवेदनशीलता और सम्मान दिखाई देना चाहिए।क्योंकि सवाल सिर्फ उस बुजुर्ग का नहीं है।सवाल यह है कि अगर आम नागरिक किसी बड़े अधिकारी के सामने अपनी बात रखने में ही असहज महसूस करने लगे, तो फिर जनसुनवाई का वास्तविक उद्देश्य क्या रह जाता है?और अगर उच्च पदों पर बैठे अधिकारी ही आम नागरिकों के सामने ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करेंगे, तो फिर नीचे काम करने वाले कर्मचारियों से हम किस तरह के मानवीय व्यवहार की उम्मीद करेंगे?पद बड़ा हो सकता है, लेकिन पद के सामने इंसान की पीड़ा छोटी नहीं हो जाती।

एक अधिकारी की असली गरिमा उसके पद, सुरक्षा या अधिकार में नहीं, बल्कि इस बात में दिखाई देती है कि वह अपने सामने खड़े सबसे कमजोर और परेशान व्यक्ति के साथ किस तरह पेश आता है।
इस पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। बुजुर्ग की वर्षों पुरानी शिकायत पर क्या कार्रवाई हुई, उसकी भी जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए और जनसुनवाई में हुए व्यवहार पर भी प्रशासन को अपना पक्ष स्पष्ट करना चाहिए।
क्योंकि लोकतंत्र में जनता केवल न्याय की उम्मीद लेकर अधिकारियों के पास नहीं जाती—
वह सम्मान के साथ न्याय की उम्मीद लेकर जाती है।

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